श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

एवं विदिततत्त्वस्य प्रकृतिर्मयि मानसम्।

युंजतो नापकुरुत आत्मारामस्य कर्हिचित्॥ २६

evaṃ viditatattvasya prakṛtirmayi mānasam|

yuṃjato nāpakuruta ātmārāmasya karhicit|| 26

अर्थ

उसी प्रकार जिसे तत्त्वज्ञान हो गया है और जो निरन्तर मुझमें ही मन लगाये रहता है, उस आत्माराम मुनिका प्रकृति कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती॥ २६॥✎ 323 1597

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #323 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1597 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्मलोक-पर्यन्त → ब्रह्मलोकपर्यन्त

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