श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.27.24

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

भुक्तभोगा परित्यक्ता दृष्टदोषा च नित्यशः।

नेश्‍वरस्याशुभं धत्ते स्वे महिम्नि स्थितस्य च॥ २४

bhuktabhogā parityaktā dṛṣṭadoṣā ca nityaśaḥ|

neśvarasyāśubhaṃ dhatte sve mahimni sthitasya ca|| 24

अर्थ

फिर नित्यप्रति दोष दीखनेसे भोगकर त्यागी हुई वह प्रकृति अपने स्वरूपमें स्थित और स्वतन्त्र (बन्धनमुक्त) हुए उस पुरुषका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती॥ २४॥✎ 323 1597

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #323 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #1597 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्मलोक-पर्यन्त → ब्रह्मलोकपर्यन्त

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