श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.61

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

मनसश्‍चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरां पतिः।

अहङ्कारस्ततो रुद्रश्चित्तं चैत्यस्ततोऽभवत्॥ ६१

manasaścandramā jāto buddhirbuddhergirāṃ patiḥ|

ahaṅkārastato rudraścittaṃ caityastato'bhavat|| 61

अर्थ

मनके बाद उसका अभिमानी देवता चन्द्रमा हुआ। फिर हृदयसे ही बुद्धि और उसके बाद उसका अभिमानी ब्रह्मा हुआ। तत्पश्चात् अहंकार और उसके अनन्तर उसका अभिमानी रुद्रदेवता उत्पन्‍न हुआ। इसके बाद चित्त और उसका अभिमानी क्षेत्रज्ञ प्रकट हुआ॥ ६१॥

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