॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.26.62
एते ह्यभ्युत्थिता देवा नैवास्योत्थापनेऽशकन्।
पुनराविविशुः खानि तमुत्थापयितुं क्रमात्॥ ६२
ete hyabhyutthitā devā naivāsyotthāpane'śakan|
punarāviviśuḥ khāni tamutthāpayituṃ kramāt|| 62
अर्थ
जब ये क्षेत्रज्ञके अतिरिक्त सारे देवता उत्पन्न होकर भी विराट् पुरुषको उठानेमें असमर्थ रहे, तो उसे उठानेके लिये क्रमशः फिर अपने-अपने उत्पत्तिस्थानोंमें प्रविष्ट होने लगे॥ ६२॥ अग्निने वाणीके साथ मुखमें प्रवेश किया, परन्तु इससे विराट् पुरुष न उठा। वायुने घ्राणेन्द्रियके सहित नासाछिद्रोंमें प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा॥ ६३॥