श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.37

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

अथो विभूतिं मम मायाविनस्ता-

मैश्‍वर्यमष्टांगमनुप्रवृत्तम् ।

श्रियं भागवतीं वास्पृहयन्ति भद्रां

परस्य मे तेऽश्नुवते तु लोके॥ ३७

atho vibhūtiṃ mama māyāvinastā-

maiśvaryamaṣṭāṃgamanupravṛttam |

śriyaṃ bhāgavatīṃ vāspṛhayanti bhadrāṃ

parasya me te'śnuvate tu loke|| 37

अर्थ

अविद्याकी निवृत्ति हो जानेपर यद्यपि वे मुझ मायापतिके सत्यादि लोकोंकी भोगसम्पत्ति, भक्तिकी प्रवृत्तिके पश्चात् स्वयं प्राप्त होनेवाली अष्टसिद्धि अथवा वैकुण्ठलोकके भगवदीय ऐश्‍वर्यकी भी इच्छा नहीं करते, तथापि मेरे धाममें पहुँचनेपर उन्हें ये सब विभूतियाँ स्वयं ही प्राप्त हो जाती हैं॥ ३७॥✎ 1311

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1311 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): रहने-वाले → रहनेवाले

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