श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.36

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

तैर्दर्शनीयावयवैरुदार-

विलासहासेक्षितवामसूक्तैः ।

हृतात्मनो हृतप्राणांश्‍च भक्ति-

रनिच्छतो मे गतिमण्वीं प्रयुङ्क्ते॥ ३६

tairdarśanīyāvayavairudāra-

vilāsahāsekṣitavāmasūktaiḥ |

hṛtātmano hṛtaprāṇāṃśca bhakti-

ranicchato me gatimaṇvīṃ prayuṅkte|| 36

अर्थ

दर्शनीय अंग-प्रत्यंग, उदार हास-विलास, मनोहर चितवन और सुमधुर वाणीसे युक्त मेरे उन रूपोंकी माधुरीमें उनका मन और इन्द्रियाँ फँस जाती हैं। ऐसी मेरी भक्ति न चाहनेपर भी उन्हें परमपदकी प्राप्ति करा देती है॥ ३६॥

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