श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

स चावतीर्णं त्रियुगमाज्ञाय विबुधर्षभम्।

विविक्त उपसंगम्य प्रणम्य समभाषत॥ २६

sa cāvatīrṇaṃ triyugamājñāya vibudharṣabham|

vivikta upasaṃgamya praṇamya samabhāṣata|| 26

अर्थ

कर्दमजीने देखा कि उनके यहाँ साक्षात् देवाधिदेव श्रीहरिने ही अवतार लिया है तो वे एकान्तमें उनके पास गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे॥ २६॥ ‘अहो! अपने पापकर्मोंके कारण इस दुःखमय संसारमें नाना प्रकारसे पीडित होते हुए पुरुषोंपर देवगण तो बहुत काल बीतनेपर प्रसन्‍न होते हैं॥ २७॥ किन्तु जिनके स्वरूपको योगिजन अनेकों जन्मोंके साधनसे सिद्ध हुई सुदृढ़ समाधिके द्वारा एकान्तमें देखनेका प्रयत्न करते हैं, अपने भक्तोंकी रक्षा करनेवाले वे ही श्रीहरि हम विषयलोलुपोंके द्वारा होनेवाली अपनी अवज्ञाका कुछ भी विचार न कर आज हमारे घर अवतीर्ण हुए हैं॥ २८-२९॥

यह व्याख्या श्लोक 3.24.26 से 3.24.29 तककी एक साथ है।

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