श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

य उद्यतमनादृत्य कीनाशमभियाचते।

क्षीयते तद्यशः स्फीतं मानश्चावज्ञया हतः॥ १३

ya udyatamanādṛtya kīnāśamabhiyācate|

kṣīyate tadyaśaḥ sphītaṃ mānaścāvajñayā hataḥ|| 13

अर्थ

जो पुरुष स्वयं प्राप्त हुए भोगका निरादर कर फिर किसी कृपणके आगे हाथ पसारता है उसका बहुत फैला हुआ यश भी नष्ट हो जाता है और दूसरोंके तिरस्कारसे मानभंग भी होता है॥ १३॥

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