जो भोग स्वतः प्राप्त हो जाय, उसकी अवहेलना करना विरक्त पुरुषको भी उचित नहीं है; फिर विषयासक्तकी तो बात ही क्या है॥ १२॥
उद्यतस्य हि कामस्य प्रतिवादो न शस्यते।
अपि निर्मुक्तसंगस्य कामरक्तस्य किं पुनः॥ १२
जो भोग स्वतः प्राप्त हो जाय, उसकी अवहेलना करना विरक्त पुरुषको भी उचित नहीं है; फिर विषयासक्तकी तो बात ही क्या है॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.22.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 342) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/22/12/