श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अहं त्वाशृणवं विद्वन् विवाहार्थं समुद्यतम्।

अतस्त्वमुपकुर्वाणः प्रत्तां प्रतिगृहाण मे॥ १४

ahaṃ tvāśṛṇavaṃ vidvan vivāhārthaṃ samudyatam|

atastvamupakurvāṇaḥ prattāṃ pratigṛhāṇa me|| 14

अर्थ

विद्वन्! मैंने सुना है, आप विवाह करनेके लिये उद्यत हैं। आपका ब्रह्मचर्य एक सीमातक है, आप नैष्ठिक ब्रह्मचारी तो हैं नहीं। इसलिये अब आप इस कन्याको स्वीकार कीजिये, मैं इसे आपको अर्पित करता हूँ॥ १४॥

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