वे बोले, ‘विश्वकर्ता ब्रह्माजी! आपकी यह (मनुओंकी) सृष्टि बड़ी ही सुन्दर है। इसमें अग्निहोत्र आदि सभी कर्म प्रतिष्ठित हैं। इसकी सहायतासे हम भी अपना अन्न (हविर्भाग) ग्रहण कर सकेंगे’॥ ५१॥✎ 296
अहो एतज्जगत्स्रष्टः सुकृतं बत ते कृतम्।
प्रतिष्ठिताः क्रिया यस्मिन् साकमन्नमदामहे॥ ५१
वे बोले, ‘विश्वकर्ता ब्रह्माजी! आपकी यह (मनुओंकी) सृष्टि बड़ी ही सुन्दर है। इसमें अग्निहोत्र आदि सभी कर्म प्रतिष्ठित हैं। इसकी सहायतासे हम भी अपना अन्न (हविर्भाग) ग्रहण कर सकेंगे’॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 334) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/20/51/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)