॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.20.52
तपसा विद्यया युक्तो योगेन सुसमाधिना।
ऋषीनृषिर्हृषीकेशः ससर्जाभिमताः प्रजाः॥ ५२
tapasā vidyayā yukto yogena susamādhinā|
ṛṣīnṛṣirhṛṣīkeśaḥ sasarjābhimatāḥ prajāḥ|| 52
अर्थ
फिर आदिऋषि ब्रह्माजीने इन्द्रियसंयमपूर्वक तप, विद्या, योग और समाधिसे सम्पन्न हो अपनी प्रिय सन्तान ऋषिगणकी रचना की और उनमेंसे प्रत्येकको अपने समाधि, योग, ऐश्वर्य, तप, विद्या और वैराग्यमय शरीरका अंश दिया॥ ५२-५३॥