श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

वितर्कयन्तो बहुधा तां सन्ध्यां प्रमदाकृतिम्।

अभिसम्भाव्य विश्रम्भात्पर्यपृच्छन् कुमेधसः॥ ३३

vitarkayanto bahudhā tāṃ sandhyāṃ pramadākṛtim|

abhisambhāvya viśrambhātparyapṛcchan kumedhasaḥ|| 33

अर्थ

इस प्रकार उन कुबुद्धि दैत्योंने स्त्रीरूपिणी संध्याके विषयमें तरह-तरहके तर्क-वितर्क करके फिर उसका बहुत आदर करते हुए प्रेमपूर्वक पूछा—॥ ३३॥

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