इस प्रकार उन कुबुद्धि दैत्योंने स्त्रीरूपिणी संध्याके विषयमें तरह-तरहके तर्क-वितर्क करके फिर उसका बहुत आदर करते हुए प्रेमपूर्वक पूछा—॥ ३३॥
वितर्कयन्तो बहुधा तां सन्ध्यां प्रमदाकृतिम्।
अभिसम्भाव्य विश्रम्भात्पर्यपृच्छन् कुमेधसः॥ ३३
इस प्रकार उन कुबुद्धि दैत्योंने स्त्रीरूपिणी संध्याके विषयमें तरह-तरहके तर्क-वितर्क करके फिर उसका बहुत आदर करते हुए प्रेमपूर्वक पूछा—॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 332) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/20/33/