श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

अहो रूपमहो धैर्यमहो अस्या नवं वयः।

मध्ये कामयमानानामकामेव विसर्पति॥ ३२

aho rūpamaho dhairyamaho asyā navaṃ vayaḥ|

madhye kāmayamānānāmakāmeva visarpati|| 32

अर्थ

‘अहो! इसका कैसा विचित्र रूप, कैसा अलौकिक धैर्य और कैसी नयी अवस्था है। देखो, हम कामपीड़ितोंके बीचमें यह कैसी बेपरवाह-सी विचर रही है’॥ ३२॥

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