श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

कासि कस्यासि रम्भोरु को वार्थस्तेऽत्र भामिनि।

रूपद्रविणपण्येन दुर्भगान्‍नो विबाधसे॥ ३४

kāsi kasyāsi rambhoru ko vārthaste'tra bhāmini|

rūpadraviṇapaṇyena durbhagānno vibādhase|| 34

अर्थ

‘सुन्दरि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो? भामिनि! यहाँ तुम्हारे आनेका क्या प्रयोजन है? तुम अपने अनूप रूपका यह बेमोल सौदा दिखाकर हम अभागोंको क्यों तरसा रही हो॥ ३४॥

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