उस समय कंसके डरसे पिता वसुदेवजीने उन्हें नन्दबाबाके व्रजमें पहुँचा दिया था। वहाँ वे बलरामजीके साथ ग्यारह वर्षतक इस प्रकार छिपकर रहे कि उनका प्रभाव व्रजके बाहर किसीपर प्रकट नहीं हुआ॥ २६॥✎ 197198199
ततो नन्दव्रजमितः पित्रा कंसाद्विबिभ्यता।
एकादश समास्तत्र गूढार्चिः सबलोऽवसत्॥ २६
उस समय कंसके डरसे पिता वसुदेवजीने उन्हें नन्दबाबाके व्रजमें पहुँचा दिया था। वहाँ वे बलरामजीके साथ ग्यारह वर्षतक इस प्रकार छिपकर रहे कि उनका प्रभाव व्रजके बाहर किसीपर प्रकट नहीं हुआ॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.2.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 244) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/2/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)