श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

परीतो वत्सपैर्वत्सांश्चारयन् व्यहरद्विभुः२।

यमुनोपवने कूजद‍्द्विजसंकुलिताङ्‌घ्रिपे॥ २७

parīto vatsapairvatsāṃścārayan vyaharadvibhuḥ|

yamunopavane kūjaddvijasaṃkulitāṅghripe|| 27

अर्थ

यमुनाके उपवनमें, जिसके हरे-भरे वृक्षोंपर कलरव करते हुए पक्षियोंके झुंड-के-झुंड रहते हैं, भगवान् श्रीकृष्णने बछड़ोंको चराते हुए ग्वालबालोंकी मण्डलीके साथ विहार किया था॥ २७॥✎ 197 198 199

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—व्यचरद् भुवि।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 244)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #197 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #198 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #199 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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