श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यो गजेन्द्रं झषग्रस्तं ध्यायन्तं चरणाम्बुजम्।

क्रोशन्तीनां करेणूनां कृच्छ्रतोऽमोचयद् द्रुतम्॥ ३५

yo gajendraṃ jhaṣagrastaṃ dhyāyantaṃ caraṇāmbujam|

krośantīnāṃ kareṇūnāṃ kṛcchrato'mocayad drutam|| 35

अर्थ

जिस समय ग्राहके पकड़नेपर गजराज प्रभुके चरणोंका ध्यान करने लगे और उनकी हथिनियाँ दुःखसे चिग्घाड़ने लगीं, उस समय जिन्होंने उन्हें तत्काल दुःखसे छुड़ाया और जो सब ओरसे निराश होकर अपनी शरणमें आये हुए सरलहृदय भक्तोंसे सहजमें ही प्रसन्‍न हो जाते हैं, किंतु दुष्ट पुरुषोंके लिये अत्यन्त दुराराध्य हैं—उनपर जल्दी प्रसन्‍न नहीं होते, उन प्रभुके उपकारोंको जाननेवाला ऐसा कौन पुरुष है, जो उनका सेवन न करेगा?॥ ३५-३६॥✎ 289 290

यह अर्थ श्लोक 35–36 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #289 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #290 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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