॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.19.36
तं सुखाराध्यमृजुभिरनन्यशरणैर्नृभिः।
कृतज्ञः को न सेवेत दुराराध्यमसाधुभिः॥ ३६
taṃ sukhārādhyamṛjubhirananyaśaraṇairnṛbhiḥ|
kṛtajñaḥ ko na seveta durārādhyamasādhubhiḥ|| 36
अर्थ
जिस समय ग्राहके पकड़नेपर गजराज प्रभुके चरणोंका ध्यान करने लगे और उनकी हथिनियाँ दुःखसे चिग्घाड़ने लगीं, उस समय जिन्होंने उन्हें तत्काल दुःखसे छुड़ाया और जो सब ओरसे निराश होकर अपनी शरणमें आये हुए सरलहृदय भक्तोंसे सहजमें ही प्रसन्न हो जाते हैं, किंतु दुष्ट पुरुषोंके लिये अत्यन्त दुराराध्य हैं—उनपर जल्दी प्रसन्न नहीं होते, उन प्रभुके उपकारोंको जाननेवाला ऐसा कौन पुरुष है, जो उनका सेवन न करेगा?॥ ३५-३६॥✎ 289 290