॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.15.7
तेषां सुपक्वयोगानां जितश्वासेन्द्रियात्मनाम्।
लब्धयुष्मत्प्रसादानां न कुतश्चित्पराभवः॥ ७
teṣāṃ supakvayogānāṃ jitaśvāsendriyātmanām|
labdhayuṣmatprasādānāṃ na kutaścitparābhavaḥ|| 7
अर्थ
आपमें सम्पूर्ण भुवन स्थित हैं, कार्य-कारणरूप सारा प्रपंच आपका शरीर है; किन्तु वास्तवमें आप इससे परे हैं। जो समस्त जीवोंके उत्पत्तिस्थान आपका अनन्यभावसे ध्यान करते हैं, उन सिद्ध योगियोंका किसी प्रकार भी ह्रास नहीं हो सकता; क्योंकि वे आपके कृपाकटाक्षसे कृतकृत्य हो जाते हैं तथा प्राण, इन्द्रिय और मनको जीत लेनेके कारण उनका योग भी परिपक्व हो जाता है॥ ६-७॥