॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.15.6
ये त्वानन्येन३ भावेन भावयन्त्यात्मभावनम्।
आत्मनि प्रोतभुवनं परं सदसदात्मकम्॥ ६
ye tvānanyena bhāvena bhāvayantyātmabhāvanam|
ātmani protabhuvanaṃ paraṃ sadasadātmakam|| 6
अर्थ
आपमें सम्पूर्ण भुवन स्थित हैं, कार्य-कारणरूप सारा प्रपंच आपका शरीर है; किन्तु वास्तवमें आप इससे परे हैं। जो समस्त जीवोंके उत्पत्तिस्थान आपका अनन्यभावसे ध्यान करते हैं, उन सिद्ध योगियोंका किसी प्रकार भी ह्रास नहीं हो सकता; क्योंकि वे आपके कृपाकटाक्षसे कृतकृत्य हो जाते हैं तथा प्राण, इन्द्रिय और मनको जीत लेनेके कारण उनका योग भी परिपक्व हो जाता है॥ ६-७॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—ये त्वामनन्यभावेन।