श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.48

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

नात्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादं

किन्त्वन्यदर्पितभयं भ्रुव उन्‍नयैस्ते।

येऽङ्ग त्वदङ्‌घ्रिशरणा भवतः कथायाः

कीर्तन्यतीर्थयशसः कुशला रसज्ञाः॥ ४८

nātyantikaṃ vigaṇayantyapi te prasādaṃ

kintvanyadarpitabhayaṃ bhruva unnayaiste|

ye'ṅga tvadaṅghriśaraṇā bhavataḥ kathāyāḥ

kīrtanyatīrthayaśasaḥ kuśalā rasajñāḥ|| 48

अर्थ

प्रभो! आपका सुयश अत्यन्त कीर्तनीय और सांसारिक दुःखोंकी निवृत्ति करनेवाला है। आपके चरणोंकी शरणमें रहनेवाले जो महाभाग आपकी कथाओंके रसिक हैं, वे आपके आत्यन्तिक प्रसाद मोक्षपदको भी कुछ अधिक नहीं गिनते; फिर जिन्हें आपकी जरा-सी टेढ़ी भौंह ही भयभीत कर देती है, उन इन्द्रपद आदि अन्य भोगोंके विषयमें तो कहना ही क्या है॥ ४८॥

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