श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.47

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तं त्वां विदाम भगवन् परमात्मतत्त्वं

तत्त्वेन सम्प्रति रतिं रचयन्तमेषाम्।

यत्तेऽनुतापविदितैर्दृढभक्तियोगै-

रुद्ग्रन्थयो हृदि विदुर्मुनयो विरागाः॥ ४७

taṃ tvāṃ vidāma bhagavan paramātmatattvaṃ

tattvena samprati ratiṃ racayantameṣām|

yatte'nutāpaviditairdṛḍhabhaktiyogai-

rudgranthayo hṛdi vidurmunayo virāgāḥ|| 47

अर्थ

भगवन्! हम आपको साक्षात् परमात्मतत्त्व ही जानते हैं। इस समय आप अपने विशुद्ध सत्त्वमय विग्रहसे अपने इन भक्तोंको आनन्दित कर रहे हैं। आपकी इस सगुण-साकार मूर्तिको राग और अहंकारसे मुक्त मुनिजन आपकी कृपादृष्टिसे प्राप्त हुए सुदृढ़ भक्तियोगके द्वारा अपने हृदयमें उपलब्ध करते हैं॥ ४७॥

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