श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.49

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता-

च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत।

वाचश्‍च नस्तुलसिवद्यदि तेऽङ्‌घ्रिशोभाः

पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्ध्रः॥ ४९

kāmaṃ bhavaḥ svavṛjinairnirayeṣu naḥ stā-

cceto'livadyadi nu te padayo rameta|

vācaśca nastulasivadyadi te'ṅghriśobhāḥ

pūryeta te guṇagaṇairyadi karṇarandhraḥ|| 49

अर्थ

भगवन्! यदि हमारा चित्त भौंरेकी तरह आपके चरणकमलोंमें ही रमण करता रहे, हमारी वाणी तुलसीके समान आपके चरणसम्बन्धसे ही सुशोभित हो और हमारे कान आपकी सुयश-सुधासे परिपूर्ण रहें तो अपने पापोंके कारण भले ही हमारा जन्म नरकादि योनियोंमें हो जाय—इसकी हमें कोई चिन्ता नहीं है॥ ४९॥

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