विदुरजी! एक बार दक्षकी पुत्री दितिने पुत्रप्राप्तिकी इच्छासे कामातुर होकर सायंकालके समय ही अपने पति मरीचिनन्दन कश्यपजीसे प्रार्थना की॥ ७॥✎ 1967
दितिर्दाक्षायणी क्षत्तर्मारीचं कश्यपं पतिम्।
अपत्यकामा चकमे सन्ध्यायां हृच्छयार्दिता॥ ७
विदुरजी! एक बार दक्षकी पुत्री दितिने पुत्रप्राप्तिकी इच्छासे कामातुर होकर सायंकालके समय ही अपने पति मरीचिनन्दन कश्यपजीसे प्रार्थना की॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 299) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/14/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1967 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): उसीके → उसीको