श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.49

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अन्तर्बहिश्चामलमब्जनेत्रं

स्वपूरुषेच्छानुगृहीतरूपम् ।

पौत्रस्तव श्रीललनाललामं

द्रष्टा स्फुरत्कुण्डलमण्डिताननम्॥ ४९

antarbahiścāmalamabjanetraṃ

svapūruṣecchānugṛhītarūpam |

pautrastava śrīlalanālalāmaṃ

draṣṭā sphuratkuṇḍalamaṇḍitānanam|| 49

अर्थ

जो इस संसारके बाहर-भीतर सब ओर विराजमान हैं, अपने भक्तोंके इच्छानुसार समय-समयपर मंगलविग्रह प्रकट करते हैं और लक्ष्मीरूप लावण्यमूर्ति ललनाकी भी शोभा बढ़ानेवाले हैं तथा जिनका मुखमण्डल झिलमिलाते हुए कुण्डलोंसे सुशोभित है—उन परम पवित्र कमलनयन श्रीहरिका तुम्हारे पौत्रको प्रत्यक्ष दर्शन होगा॥ ४९॥✎ 260

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #260 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें