॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.14.48
अलम्पटः शीलधरो गुणाकरो
हृष्टः परर्द्ध्या व्यथितो दुःखितेषु।✎ 2010
अभूतशत्रुर्जगतः शोकहर्ता
नैदाघिकं तापमिवोडुराजः॥ ४८
alampaṭaḥ śīladharo guṇākaro
hṛṣṭaḥ pararddhyā vyathito duḥkhiteṣu|
abhūtaśatrurjagataḥ śokahartā
naidāghikaṃ tāpamivoḍurājaḥ|| 48
अर्थ
वह विषयोंमें अनासक्त, शीलवान्, गुणोंका भंडार तथा दूसरोंकी समृद्धिमें सुख और दुःखमें दुःख माननेवाला होगा। उसका कोई शत्रु न होगा तथा चन्द्रमा जैसे ग्रीष्म ऋतुके तापको हर लेता है, वैसे ही वह संसारके शोकको शान्त करनेवाला होगा॥ ४८॥✎ 260