श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.48

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अलम्पटः शीलधरो गुणाकरो

हृष्टः परर्द्ध्या व्यथितो दुःखितेषु।✎ 2010

अभूतशत्रुर्जगतः शोकहर्ता

नैदाघिकं तापमिवोडुराजः॥ ४८

alampaṭaḥ śīladharo guṇākaro

hṛṣṭaḥ pararddhyā vyathito duḥkhiteṣu|

abhūtaśatrurjagataḥ śokahartā

naidāghikaṃ tāpamivoḍurājaḥ|| 48

अर्थ

वह विषयोंमें अनासक्त, शीलवान्, गुणोंका भंडार तथा दूसरोंकी समृद्धिमें सुख और दुःखमें दुःख माननेवाला होगा। उसका कोई शत्रु न होगा तथा चन्द्रमा जैसे ग्रीष्म ऋतुके तापको हर लेता है, वैसे ही वह संसारके शोकको शान्त करनेवाला होगा॥ ४८॥✎ 260

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #260 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को
  • #2010 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): रर्द्धॺा व्य → रर्द्ध्या व्य

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