॥ श्रीहरिः ॥
स वै स्वायम्भुवः सम्राट् प्रियः पुत्रः स्वयम्भुवः।
प्रतिलभ्य प्रियां पत्नीं किं चकार ततो मुने॥ २
sa vai svāyambhuvaḥ samrāṭ priyaḥ putraḥ svayambhuvaḥ|
pratilabhya priyāṃ patnīṃ kiṃ cakāra tato mune|| 2
अर्थ
विदुरजीने कहा—मुने! स्वयम्भू ब्रह्माजीके प्रिय पुत्र महाराज स्वायम्भुव मनुने अपनी प्रिय पत्नी शतरूपाको पाकर फिर क्या किया?॥ २॥✎ 1306
स वै स्वायम्भुवः सम्राट् प्रियः पुत्रः स्वयम्भुवः।
प्रतिलभ्य प्रियां पत्नीं किं चकार ततो मुने॥ २
विदुरजीने कहा—मुने! स्वयम्भू ब्रह्माजीके प्रिय पुत्र महाराज स्वायम्भुव मनुने अपनी प्रिय पत्नी शतरूपाको पाकर फिर क्या किया?॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.13.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 292) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/13/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1306 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीविष्णु-भगवान्के → श्रीविष्णुभगवान्के