श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सोऽवध्यातः सुतैरेवं प्रत्याख्यातानुशासनैः।

क्रोधं दुर्विषहं जातं नियन्तुमुपचक्रमे॥ ६

so'vadhyātaḥ sutairevaṃ pratyākhyātānuśāsanaiḥ|

krodhaṃ durviṣahaṃ jātaṃ niyantumupacakrame|| 6

अर्थ

जब ब्रह्माजीने देखा कि मेरी आज्ञा न मानकर ये मेरे पुत्र मेरा तिरस्कार कर रहे हैं, तब उन्हें असह्य क्रोध हुआ। उन्होंने उसे रोकनेका प्रयत्न किया॥ ६॥✎ 1590

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1590 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बुद्धि-द्वारा → बुद्धिद्वारा

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें