श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.41

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

विद्या दानं तपः सत्यं धर्मस्येति पदानि च।

आश्रमांश्‍च यथासंख्यमसृजत्सह वृत्तिभिः॥ ४१

vidyā dānaṃ tapaḥ satyaṃ dharmasyeti padāni ca|

āśramāṃśca yathāsaṃkhyamasṛjatsaha vṛttibhiḥ|| 41

अर्थ

विद्या, दान, तप और सत्य—ये धर्मके चार पाद और वृत्तियोंके सहित चार आश्रम भी इसी क्रमसे प्रकट हुए॥ ४१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें