श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

षोडश्यु क्थौ पूर्ववक्‍त्रात्पुरीष्यग्‍निष्टुतावथ।

आप्तोर्यामातिरात्रौ च वाजपेयं सगोसवम्॥ ४०

ṣoḍaśyu kthau pūrvavaktrātpurīṣyagniṣṭutāvatha|

āptoryāmātirātrau ca vājapeyaṃ sagosavam|| 40

अर्थ

श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! ब्रह्माने अपने पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तरके मुखसे क्रमशः ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेदोंको रचा तथा इसी क्रमसे शस्त्र (होताका कर्म), इज्या (अध्वर्युका कर्म), स्तुतिस्तोम (उद्गाताका कर्म) और प्रायश्चित्त (ब्रह्माका कर्म)—इन चारोंकी रचना की॥ ३७॥ इसी प्रकार आयुर्वेद (चिकित्साशास्त्र), धनुर्वेद (शस्त्रविद्या), गान्धर्ववेद (संगीतशास्त्र) और स्थापत्यवेद (शिल्पविद्या)—इन चार उपवेदोंको भी क्रमशः उन पूर्वादि मुखोंसे ही उत्पन्‍न किया॥ ३८॥ फिर सर्वदर्शी भगवान् ब्रह्माने अपने चारों मुखोंसे इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद बनाया॥ ३९॥ इसी क्रमसे षोडशी और उक्थ, चयन और अग्‍निष्टोम, आप्तोर्याम और अतिरात्र तथा वाजपेय और गोसव—ये दो-दो याग भी उनके पूर्वादि मुखोंसे ही उत्पन्‍न हुए॥ ४०॥ विद्या, दान, तप और सत्य—ये धर्मके चार पाद और वृत्तियोंके सहित चार आश्रम भी इसी क्रमसे प्रकट हुए॥ ४१॥ सावित्र*, प्राजापत्य१, ब्राह्म२ और बृहत्३—ये चार वृत्तियाँ ब्रह्मचारीकी हैं तथा वार्ता४, संचय५, शालीन६ और शिलोञ्छ७—ये चार वृत्तियाँ गृहस्थकी हैं॥ ४२॥ इसी प्रकार वृत्तिभेदसे वैखानस८, वालखिल्य९, औदुम्बर१० और फेनप११—ये चार भेद वानप्रस्थोंके तथा कुटीचक१२, बहूदक१३, हंस१४ और निष्क्रिय (परमहंस१५)—ये चार भेद संन्यासियोंके हैं॥ ४३॥

यह व्याख्या श्लोक 3.12.37 से 3.12.43 तककी एक साथ है।

टिप्पणियाँ

  1. *

    उपनयन-संस्कारके पश्चात् गायत्रीका अध्ययन करनेके लिये धारण किया जानेवाला तीन दिनका ब्रह्मचर्यव्रत।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  2. १

    एक वर्षका ब्रह्मचर्यव्रत।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  3. २

    वेदाध्ययनकी समाप्तितक रहनेवाला ब्रह्मचर्यव्रत।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  4. ३

    आयुपर्यन्त रहनेवाला ब्रह्मचर्यव्रत।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  5. ४

    कृषि आदि शास्त्रविहित वृत्तियाँ।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  6. ५

    यागादि कराना।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  7. ६

    अयाचितवृत्ति।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  8. ७

    खेत कट जानेपर पृथ्वीपर पड़े हुए तथा अनाजकी मंडीमें गिरे हुए दानोंको बीनकर निर्वाह करना।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  9. ८

    बिना जोती-बोयी भूमिसे उत्पन्‍न हुए पदार्थोंसे निर्वाह करनेवाले।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  10. ९

    नवीन अन्‍न मिलनेपर पहला संचय करके रखा हुआ अन्‍न दान कर देनेवाले।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  11. १०

    प्रातःकाल उठनेपर जिस दिशाकी ओर मुख हो उसी ओरसे फलादि लाकर निर्वाह करनेवाले।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  12. ११

    अपने-आप झड़े हुए फलादि खाकर रहनेवाले।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  13. १२

    कुटी बनाकर एक जगह रहने और आश्रमके धर्मोंका पूरा पालन करनेवाले।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  14. १३

    कर्मकी ओर गौणदृष्टि रखकर ज्ञानको ही प्रधान माननेवाले।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  15. १४

    ज्ञानाभ्यासी।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)
  16. १५

    ज्ञानी जीवन्मुक्त।

    (मुद्रित पृष्ठ 290)

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