॥ श्रीहरिः ॥
सावित्रं प्राजापत्यं च ब्राह्मं चाथ बृहत्तथा।
वार्तासञ्चयशालीनशिलोञ्छ इति वै गृहे॥ ४२
sāvitraṃ prājāpatyaṃ ca brāhmaṃ cātha bṛhattathā|
vārtāsañcayaśālīnaśiloñcha iti vai gṛhe|| 42
अर्थ
सावित्र*, प्राजापत्य१, ब्राह्म२ और बृहत्३—ये चार वृत्तियाँ ब्रह्मचारीकी हैं तथा वार्ता४, संचय५, शालीन६ और शिलोञ्छ७—ये चार वृत्तियाँ गृहस्थकी हैं॥ ४२॥
सावित्रं प्राजापत्यं च ब्राह्मं चाथ बृहत्तथा।
वार्तासञ्चयशालीनशिलोञ्छ इति वै गृहे॥ ४२
सावित्र, प्राजापत्य, ब्राह्म और बृहत्—ये चार वृत्तियाँ ब्रह्मचारीकी हैं तथा वार्ता, संचय, शालीन और शिलोञ्छ—ये चार वृत्तियाँ गृहस्थकी हैं॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.12.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 290) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/12/42/टिप्पणियाँ
- *
उपनयन-संस्कारके पश्चात् गायत्रीका अध्ययन करनेके लिये धारण किया जानेवाला तीन दिनका ब्रह्मचर्यव्रत।
(मुद्रित पृष्ठ 290) - १
एक वर्षका ब्रह्मचर्यव्रत।
(मुद्रित पृष्ठ 290) - २
वेदाध्ययनकी समाप्तितक रहनेवाला ब्रह्मचर्यव्रत।
(मुद्रित पृष्ठ 290) - ३
आयुपर्यन्त रहनेवाला ब्रह्मचर्यव्रत।
(मुद्रित पृष्ठ 290) - ४
कृषि आदि शास्त्रविहित वृत्तियाँ।
(मुद्रित पृष्ठ 290) - ५
यागादि कराना।
(मुद्रित पृष्ठ 290) - ६
अयाचितवृत्ति।
(मुद्रित पृष्ठ 290) - ७
खेत कट जानेपर पृथ्वीपर पड़े हुए तथा अनाजकी मंडीमें गिरे हुए दानोंको बीनकर निर्वाह करना।
(मुद्रित पृष्ठ 290)