अपने पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंको अपने सामने इस प्रकार कहते देख प्रजापतियोंके पति ब्रह्माजी बड़े लज्जित हुए और उन्होंने उस शरीरको उसी समय छोड़ दिया। तब उस घोर शरीरको दिशाओंने ले लिया। वही कुहरा हुआ, जिसे अन्धकार भी कहते हैं॥ ३३॥✎ 251
स इत्थं गृणतः पुत्रान् पुरो दृष्ट्वा प्रजापतीन्।
प्रजापतिपतिस्तन्वं तत्याज व्रीडितस्तदा।
तां दिशो जगृहुर्घोरां नीहारं यद्विदुस्तमः॥ ३३
अपने पुत्र मरीचि आदि प्रजापतियोंको अपने सामने इस प्रकार कहते देख प्रजापतियोंके पति ब्रह्माजी बड़े लज्जित हुए और उन्होंने उस शरीरको उसी समय छोड़ दिया। तब उस घोर शरीरको दिशाओंने ले लिया। वही कुहरा हुआ, जिसे अन्धकार भी कहते हैं॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.12.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 289) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/12/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#251 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने