एक बार ब्रह्माजी यह सोच रहे थे कि ‘मैं पहलेकी तरह सुव्यवस्थित रूपसे सब लोकोंकी रचना किस प्रकार करूँ?’ इसी समय उनके चार मुखोंसे चार वेद प्रकट हुए॥ ३४॥
कदाचिद् ध्यायतः स्रष्टुर्वेदा आसंश्चतुर्मुखात्।
कथं स्रक्ष्याम्यहं लोकान् समवेतान् यथा पुरा॥ ३४
एक बार ब्रह्माजी यह सोच रहे थे कि ‘मैं पहलेकी तरह सुव्यवस्थित रूपसे सब लोकोंकी रचना किस प्रकार करूँ?’ इसी समय उनके चार मुखोंसे चार वेद प्रकट हुए॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.12.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 289) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/12/34/