ātmasthaṃ vyañjayāmāsa sa dharmaṃ pātumarhati|| 32
अर्थ
जिन श्रीभगवान्ने अपने स्वरूपमें स्थित इस जगत्को अपने ही तेजसे प्रकट किया है, उन्हें नमस्कार है। इस समय वे ही धर्मकी रक्षा कर सकते हैं’॥ ३२॥✎ 251
तस्मै नमो भगवते य इदं स्वेन रोचिषा।
आत्मस्थं व्यञ्जयामास स धर्मं पातुमर्हति॥ ३२
जिन श्रीभगवान्ने अपने स्वरूपमें स्थित इस जगत्को अपने ही तेजसे प्रकट किया है, उन्हें नमस्कार है। इस समय वे ही धर्मकी रक्षा कर सकते हैं’॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.12.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 289) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/12/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#251 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने