श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तेजीयसामपि ह्येतन्‍न सुश्लोक्यं जगद‍्गुरो।

यद‍्वृत्तमनुतिष्ठन् वै लोकः क्षेमाय कल्पते॥ ३१

tejīyasāmapi hyetanna suślokyaṃ jagadguro|

yadvṛttamanutiṣṭhan vai lokaḥ kṣemāya kalpate|| 31

अर्थ

जगद‍्गुरो! आप-जैसे तेजस्वी पुरुषोंको भी ऐसा काम शोभा नहीं देता; क्योंकि आपलोगोंके आचरणोंका अनुसरण करनेसे ही तो संसारका कल्याण होता है॥ ३१॥✎ 251

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #251 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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