yadvṛttamanutiṣṭhan vai lokaḥ kṣemāya kalpate|| 31
अर्थ
जगद्गुरो! आप-जैसे तेजस्वी पुरुषोंको भी ऐसा काम शोभा नहीं देता; क्योंकि आपलोगोंके आचरणोंका अनुसरण करनेसे ही तो संसारका कल्याण होता है॥ ३१॥✎ 251
तेजीयसामपि ह्येतन्न सुश्लोक्यं जगद्गुरो।
यद्वृत्तमनुतिष्ठन् वै लोकः क्षेमाय कल्पते॥ ३१
जगद्गुरो! आप-जैसे तेजस्वी पुरुषोंको भी ऐसा काम शोभा नहीं देता; क्योंकि आपलोगोंके आचरणोंका अनुसरण करनेसे ही तो संसारका कल्याण होता है॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.12.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 289) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/12/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#251 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने