अब आगे मैं वंश और मन्वन्तरादिका वर्णन करूँगा। इस प्रकार सृष्टि करनेवाले सत्यसंकल्प भगवान् हरि ही ब्रह्माके रूपसे प्रत्येक कल्पके आदिमें रजोगुणसे व्याप्त होकर स्वयं ही जगत्के रूपमें अपनी ही रचना करते हैं॥ २९॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि वंशान्मन्वन्तराणि च।
एवं रजःप्लुतः स्रष्टा कल्पादिष्वात्मभूर्हरिः।
सृजत्यमोघसङ्कल्प आत्मैवात्मानमात्मना॥ २९
अब आगे मैं वंश और मन्वन्तरादिका वर्णन करूँगा। इस प्रकार सृष्टि करनेवाले सत्यसंकल्प भगवान् हरि ही ब्रह्माके रूपसे प्रत्येक कल्पके आदिमें रजोगुणसे व्याप्त होकर स्वयं ही जगत्के रूपमें अपनी ही रचना करते हैं॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.10.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 281) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/10/29/