श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.11.1

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अथैकादशोऽध्यायः

मन्वन्तरादि कालविभागका वर्णन

मैत्रेय उवाच

चरमः सद्विशेषाणामनेकोऽसंयुतः सदा।

परमाणुः स विज्ञेयो नृणामैक्यभ्रमो यतः॥ १

caramaḥ sadviśeṣāṇāmaneko'saṃyutaḥ sadā|

paramāṇuḥ sa vijñeyo nṛṇāmaikyabhramo yataḥ|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! पृथ्वी आदि कार्यवर्गका जो सूक्ष्मतम अंश है—जिसका और विभाग नहीं हो सकता तथा जो कार्यरूपको प्राप्त नहीं हुआ है और जिसका अन्य परमाणुओंके साथ संयोग भी नहीं हुआ है उसे परमाणु कहते हैं। इन अनेक परमाणुओंके परस्पर मिलनेसे ही मनुष्योंको भ्रमवश उनके समुदायरूप एक अवयवीकी प्रतीति होती है॥ १॥

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