श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

भूतप्रेतपिशाचाश्‍च विद्याध्राः किन्‍नरादयः।

दशैते विदुराख्याताः सर्गास्ते विश्‍वसृक्कृताः॥ २८

bhūtapretapiśācāśca vidyādhrāḥ kinnarādayaḥ|

daśaite vidurākhyātāḥ sargāste viśvasṛkkṛtāḥ|| 28

अर्थ

देवता, पितर, असुर, गन्धर्व-अप्सरा, यक्ष-राक्षस, सिद्ध-चारण-विद्याधर, भूत-प्रेत-पिशाच और किन्‍नर-किम्पुरुष-अश्‍वमुख आदि भेदसे देवसृष्टि आठ प्रकारकी है। विदुरजी! इस प्रकार जगत‍्कर्ता श्रीब्रह्माजीकी रची हुई यह दस प्रकारकी सृष्टि मैंने तुमसे कही ॥ २७-२८॥

यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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