श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

तिरश्चामष्टमः सर्गः सोऽष्टाविंशद्विधो मतः।

अविदो भूरितमसो घ्राणज्ञा हृद्यवेदिनः॥ २०

tiraścāmaṣṭamaḥ sargaḥ so'ṣṭāviṃśadvidho mataḥ|

avido bhūritamaso ghrāṇajñā hṛdyavedinaḥ|| 20

अर्थ

आठवीं सृष्टि तिर्यग्योनियों (पशु-पक्षियों)-की है। वह अट्ठाईस प्रकारकी मानी जाती है। इन्हें कालका ज्ञान नहीं होता, तमोगुणकी अधिकताके कारण ये केवल खाना-पीना, मैथुन करना, सोना आदि ही जानते हैं, इन्हें सूँघनेमात्रसे वस्तुओंका ज्ञान हो जाता है। इनके हृदयमें विचारशक्ति या दूरदर्शिता नहीं होती॥ २०॥✎ 1589

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1589 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (मुँह)-से → (मुँह)से

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