श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

वनस्पत्योषधिलतात्वक्सारा वीरुधो द्रुमाः।

उत्स्रोतसस्तमः प्राया अन्तःस्पर्शा विशेषिणः॥ १९

vanaspatyoṣadhilatātvaksārā vīrudho drumāḥ|

utsrotasastamaḥ prāyā antaḥsparśā viśeṣiṇaḥ|| 19

अर्थ

वनस्पति१, ओषधि,२ लता,३ त्वक्सार,४ वीरुध५ और द्रुम६ इनका संचार नीचे (जड़)-से ऊपरकी ओर होता है, इनमें प्रायः ज्ञानशक्ति प्रकट नहीं रहती, ये भीतर-ही-भीतर केवल स्पर्शका अनुभव करते हैं तथा इनमेंसे प्रत्येकमें कोई विशेष गुण रहता है॥ १९॥✎ 1589

टिप्पणियाँ

  1. १

    जो बिना मौर आये ही फलते हैं, जैसे गूलर, बड़, पीपल आदि।

    (मुद्रित पृष्ठ 280)
  2. २

    जो फलोंके पक जानेपर नष्ट हो जाते हैं, जैसे धान, गेहूँ, चना आदि।

    (मुद्रित पृष्ठ 280)
  3. ३

    जो किसीका आश्रय लेकर बढ़ते हैं, जैसे ब्राह्मी, गिलोय आदि।

    (मुद्रित पृष्ठ 280)
  4. ४

    जिनकी छाल बहुत कठोर होती है, जैसे बाँस आदि।

    (मुद्रित पृष्ठ 280)
  5. ५

    जो लता पृथ्वीपर ही फैलती है, किन्तु कठोर होनेसे ऊपरकी ओर नहीं चढ़ती—जैसे खरबूजा, तरबूजा आदि।

    (मुद्रित पृष्ठ 280)
  6. ६

    जिनमें पहले फूल आकर फिर उन फूलोंके स्थानमें ही फल लगते हैं, जैसे आम, जामुन आदि।

    (मुद्रित पृष्ठ 280)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1589 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (मुँह)-से → (मुँह)से

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