saptamo mukhyasargastu ṣaḍvidhastasthuṣāṃ ca yaḥ|| 18
अर्थ
जो भगवान् अपना चिन्तन करनेवालोंके समस्त दुःखोंको हर लेते हैं, यह सारी लीला उन्हीं श्रीहरिकी है। वे ही ब्रह्माके रूपमें रजोगुणको स्वीकार करके जगत्की रचना करते हैं। छः प्रकारकी प्राकृत सृष्टियोंके बाद सातवीं प्रधान वैकृत सृष्टि इन छः प्रकारके स्थावर वृक्षोंकी होती है॥ १८॥✎ 1589
रजोभाजो भगवतो लीलेयं हरिमेधसः।
सप्तमो मुख्यसर्गस्तु षड्विधस्तस्थुषां च यः॥ १८
जो भगवान् अपना चिन्तन करनेवालोंके समस्त दुःखोंको हर लेते हैं, यह सारी लीला उन्हीं श्रीहरिकी है। वे ही ब्रह्माके रूपमें रजोगुणको स्वीकार करके जगत्की रचना करते हैं। छः प्रकारकी प्राकृत सृष्टियोंके बाद सातवीं प्रधान वैकृत सृष्टि इन छः प्रकारके स्थावर वृक्षोंकी होती है॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.10.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 280) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/10/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)