श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.26

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यथाऽऽत्ममायायोगेन नानाशक्त्युपबृंहितम्।

विलुम्पन् विसृजन् गृह्णन् बिभ्रदात्मानमात्मना॥ २६

yathā''tmamāyāyogena nānāśaktyupabṛṃhitam|

vilumpan visṛjan gṛhṇan bibhradātmānamātmanā|| 26

अर्थ

आप मायाके स्वामी हैं, आपका संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता। जैसे मकड़ी अपने मुँहसे जाला निकालकर उसमें क्रीड़ा करती है और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेती है, वैसे ही आप अपनी मायाका आश्रय लेकर इस विविध-शक्तिसम्पन्‍न जगत‍्की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेके लिये अपने-आपको ही अनेक रूपोंमें बना देते हैं और क्रीड़ा करते हैं। इस प्रकार आप कैसे करते हैं—इस मर्मको मैं जान सकूँ, ऐसा ज्ञान आप मुझे दीजिये॥ २६-२७॥

यह अर्थ श्लोक 26–27 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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