॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.9.27
क्रीडस्यमोघसङ्कल्प ऊर्णनाभिर्यथोर्णुते।
तथा तद्विषयां धेहि मनीषां मयि३ माधव॥ २७
krīḍasyamoghasaṅkalpa ūrṇanābhiryathorṇute|
tathā tadviṣayāṃ dhehi manīṣāṃ mayi mādhava|| 27
अर्थ
आप मायाके स्वामी हैं, आपका संकल्प कभी व्यर्थ नहीं होता। जैसे मकड़ी अपने मुँहसे जाला निकालकर उसमें क्रीड़ा करती है और फिर उसे अपनेमें लीन कर लेती है, वैसे ही आप अपनी मायाका आश्रय लेकर इस विविध-शक्तिसम्पन्न जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेके लिये अपने-आपको ही अनेक रूपोंमें बना देते हैं और क्रीड़ा करते हैं। इस प्रकार आप कैसे करते हैं—इस मर्मको मैं जान सकूँ, ऐसा ज्ञान आप मुझे दीजिये॥ २६-२७॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—मम।