नाथ! आप कृपा करके मुझ याचककी यह माँग पूरी कीजिये कि मैं रूपरहित आपके सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपोंको जान सकूँ॥ २५॥
तथापि नाथमानस्य नाथ नाथय नाथितम्।
परावरे यथा रूपे जानीयां ते त्वरूपिणः॥ २५
नाथ! आप कृपा करके मुझ याचककी यह माँग पूरी कीजिये कि मैं रूपरहित आपके सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपोंको जान सकूँ॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.9.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 225) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/9/25/