श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.43

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

वेदाहमङ्ग परमस्य हि योगमायां

यूयं भवश्‍च भगवानथ दैत्यवर्यः।

पत्नी मनोः स च मनुश्‍च तदात्मजाश्‍च

प्राचीनबर्हिर्ऋभुरङ्ग उत ध्रुवश्‍च॥ ४३✎ 1001 1002

vedāhamaṅga paramasya hi yogamāyāṃ

yūyaṃ bhavaśca bhagavānatha daityavaryaḥ|

patnī manoḥ sa ca manuśca tadātmajāśca

prācīnabarhir:ṛbhuraṅga uta dhruvaśca|| 43

अर्थ

प्यारे नारद! परम पुरुषकी उस योगमायाको मैं जानता हूँ तथा तुमलोग, भगवान् शंकर, दैत्यकुल-भूषण प्रह्लाद, शतरूपा, मनु, मनुपुत्र प्रियव्रत आदि, प्राचीनबर्हि, ऋभु और ध्रुव भी जानते हैं॥ ४३॥✎ 158 159 160

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (5)
  • #158 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #159 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #160 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1001 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्राचीनबर्हिऋर्भुरङ्ग → प्राचीनबर्हिऋर्ऋभुरङ्ग
  • #1002 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्राचीनबर्हिऋर्ऋभुरङ्ग → प्राचीनबर्हिर्ऋभुरङ्ग

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