श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.44

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

इक्ष्वाकुरैलमुचुकुन्दविदेहगाधि-

रघ्वम्बरीषसगरा गयनाहुषाद्याः।

मान्धात्रलर्कशतधन्वनुरन्तिदेवा

देवव्रतो बलिरमूर्त्तरयो दिलीपः॥ ४४

ikṣvākurailamucukundavidehagādhi-

raghvambarīṣasagarā gayanāhuṣādyāḥ|

māndhātralarkaśatadhanvanurantidevā

devavrato baliramūrttarayo dilīpaḥ|| 44

अर्थ

इनके सिवा इक्ष्वाकु, पुरूरवा, मुचुकुन्द, जनक, गाधि, रघु, अम्बरीष, सगर, गय, ययाति आदि तथा मान्धाता, अलर्क, शतधन्वा, अनु, रन्तिदेव, भीष्म, बलि अमूर्त्तरय, दिलीप, सौभरि, उत्तंक, शिबि, देवल, पिप्पलाद, सारस्वत, उद्धव, पराशर, भूरिषेण एवं विभीषण, हनुमान्, शुकदेव, अर्जुन, आर्ष्टिषेण, विदुर और श्रुतदेव आदि महात्मा भी जानते हैं॥ ४४-४५॥✎ 158 159 160

यह अर्थ श्लोक 44–45 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #158 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #159 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #160 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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