श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.31

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

सृजामि तन्‍नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वशः।

विश्‍वं पुरुषरूपेण परिपाति त्रिशक्तिधृक्॥ ३१

sṛjāmi tanniyukto'haṃ haro harati tadvaśaḥ|

viśvaṃ puruṣarūpeṇa paripāti triśaktidhṛk|| 31

अर्थ

उन्हींकी प्रेरणासे मैं इस संसारकी रचना करता हूँ। उन्हींके अधीन होकर रुद्र इसका संहार करते हैं और वे स्वयं ही विष्णुके रूपसे इसका पालन करते हैं। क्योंकि उन्होंने सत्त्व, रज और तमकी तीन शक्तियाँ स्वीकार कर रखी हैं॥ ३१॥✎ 141 142

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #141 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #142 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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