श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.30

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नारायणे भगवति तदिदं विश्‍वमाहितम्।

गृहीतमायोरुगुणः सर्गादावगुणः स्वतः॥ ३०

nārāyaṇe bhagavati tadidaṃ viśvamāhitam|

gṛhītamāyoruguṇaḥ sargādāvaguṇaḥ svataḥ|| 30

अर्थ

नारद! यह सम्पूर्ण विश्‍व उन्हीं भगवान् नारायणमें स्थित है जो स्वयं तो प्राकृत गुणोंसे रहित हैं, परन्तु सृष्टिके प्रारम्भमें मायाके द्वारा बहुत-से गुण ग्रहण कर लेते हैं॥ ३०॥✎ 141 142

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #141 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #142 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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