बेटा! जो कुछ तुमने पूछा था, उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया; भाव या अभाव, कार्य या कारणके रूपमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो भगवान्से भिन्न हो॥ ३२॥✎ 141142
इति तेऽभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि।
नान्यद्भगवतः किञ्चिद्भाव्यं सदसदात्मकम्॥ ३२
बेटा! जो कुछ तुमने पूछा था, उसका उत्तर मैंने तुम्हें दे दिया; भाव या अभाव, कार्य या कारणके रूपमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो भगवान्से भिन्न हो॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.6.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 206) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/6/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)